छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मूक-बधिर पीड़िता के 'इशारों' को माना पुख्ता सबूत, दुष्कर्म के दोषी को ताउम्र कैद

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मानवीय संवेदना और न्याय की मिसाल पेश करते हुए मूक-बधिर युवती से अनाचार के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी गवाह के केवल बोल या सुन न पाने के आधार पर उसकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। संकेतों के माध्यम से दी गई जानकारी भी कानून की नजर में 'मौखिक साक्ष्य' के समान ही मान्य है।
प्लास्टिक की गुड़िया बनी न्याय का जरिया
यह मामला बालोद जिले के अर्जुंदा क्षेत्र का है, जहाँ वर्ष 2020 में एक रिश्तेदार (नीलम कुमार देशमुख) ने युवती की बेबसी का फायदा उठाकर दुष्कर्म किया था। पीड़िता जन्म से ही मूक-बधिर थी, जिससे कोर्ट में बयान दर्ज कराना एक चुनौती थी।
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विशेष प्रक्रिया: ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट की मदद ली।
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साक्ष्य का तरीका: जब इशारों में कठिनाई आई, तो कोर्ट ने प्लास्टिक की गुड़िया मंगवाई। पीड़िता ने गुड़िया के माध्यम से संकेतों में आरोपी की करतूत बयां की, जिसे कोर्ट ने अत्यंत विश्वसनीय माना।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने आरोपी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा:
"मूक-बधिर गवाह द्वारा संकेतों में दी गई गवाही को साक्ष्य अधिनियम के तहत मौखिक साक्ष्य माना जाता है। पीड़िता की गवाही पूरी तरह भरोसेमंद है और मेडिकल व फॉरेंसिक रिपोर्ट (DNA साक्ष्य) भी जुर्म की पुष्टि करते हैं।"
सजा का विवरण
हाईकोर्ट ने आरोपी नीलम कुमार देशमुख को निम्नलिखित धाराओं के तहत दंडित किया है:
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धारा 376(2): मृत्यु होने तक (ताउम्र) कठोर कारावास।
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धारा 450: घर में जबरन घुसने के लिए 5 वर्ष की जेल।
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अर्थदंड: दोषी पर 21 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
प्रशासनिक और न्यायिक संदेश
इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि शारीरिक अक्षमता न्याय के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। हाईकोर्ट ने न केवल पीड़िता के साहस को सराहा, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों और विशेष परिस्थितियों में अपनाई गई गवाही की प्रक्रिया को भी सही ठहराया। आरोपी वर्तमान में जेल में निरुद्ध है और उसे शेष जीवन जेल की सलाखों के पीछे बिताना होगा।
कंचन यादव
नारद एक्स्प्रेस न्यूज