गुजरात के जूनागढ़ में 'डायरो' के दौरान नोटों की बारिश; मंच पर उड़ेली गईं पैसों से भरी बोरियां, छिड़ी बहस

गुजरात के जूनागढ़ में 'डायरो' के दौरान नोटों की बारिश; मंच पर उड़ेली गईं पैसों से भरी बोरियां, छिड़ी बहस

जूनागढ़: गुजरात के जूनागढ़ जिले में आयोजित एक धार्मिक भजन कार्यक्रम का वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो ने न केवल लोगों को हैरान कर दिया है, बल्कि देश भर में धन के इस तरह के प्रदर्शन को लेकर एक बड़ी बहस भी छेड़ दी है।

प्रसिद्ध कलाकार कविराज जिग्नेश के इस 'डायरो' (लोक संगीत और भजन कार्यक्रम) के दौरान, श्रद्धालुओं ने भक्ति के अतिरेक में मंच पर पैसों से भरे थैले और बोरियां उड़ेल दीं। देखते ही देखते भजन गायक गोपाल साधु नोटों के एक विशाल ढेर के बीच घिरे नजर आए।


क्या है 'डायरो' परंपरा?

गुजरात में 'डायरो' (Dayro) लोक साहित्य, संगीत, धार्मिक भजनों और सामाजिक विमर्श की एक अत्यंत समृद्ध और प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है।

  • इस पारंपरिक आयोजन में लोग गायक और कलाकारों की प्रस्तुति से मंत्रमुग्ध होकर उन पर स्वेच्छा से पैसे उड़ाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'घोल' कहा जाता है।

  • लोक कल्याण के लिए उपयोग: डायरो में एकत्रित होने वाली इस भारी-भरकम राशि को कलाकार अपने पास नहीं रखते, बल्कि इसका उपयोग सामाजिक कार्यों, गौशालाओं के रख-रखाव, अनाथालयों, अस्पतालों या अन्य धार्मिक व जनहित के कार्यों के लिए किया जाता है।


इंटरनेट पर छिड़ी बहस: लोगों ने क्या कहा?

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद नेटिजन्स (इंटरनेट यूजर्स) दो धड़ों में बंट गए हैं और इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं:

  • सकारात्मक पक्ष (परंपरा का समर्थन): कई स्थानीय लोगों और परंपरा के समर्थकों का कहना है कि यह गुजरात की संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पैसा किसी निजी विलासिता के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण और परोपकार के लिए दान के रूप में दिया जाता है, जिसे बेहद पवित्र माना जाता है।

  • नकारात्मक पक्ष (प्रदर्शन पर आपत्ति): इसके विपरीत, आलोचकों और कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर गहरी आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि भले ही पैसा नेक काम के लिए जा रहा हो, लेकिन बोरियों से नोट उड़ेलना धन का भद्दा प्रदर्शन है। कुछ यूजर्स ने इसे देश की आर्थिक असमानता का मजाक उड़ाना बताया, तो कुछ ने इस पर आयकर विभाग (Income Tax) की नजर होने की बात भी कही।

निष्कर्ष: जूनागढ़ की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आस्था और परंपरा के नाम पर होने वाले इस तरह के भव्य प्रदर्शन की सीमा क्या होनी चाहिए। जहां एक ओर यह संस्कृति की भव्यता को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक समाज में इसे फिजूलखर्ची और दिखावे के चश्मे से भी देखा जा रहा है।

कंचन यादव 

सहसंपादक/नारद एक्स्प्रेस न्यूज