विश्व गौरैया दिवस: आंगन की चहक बचाने का संकल्प, पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षक है नन्हीं गौरैया

विश्व गौरैया दिवस: आंगन की चहक बचाने का संकल्प, पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षक है नन्हीं गौरैया

रायपुर: आज पूरी दुनिया 'विश्व गौरैया दिवस' मना रही है। यह दिन महज एक पक्षी के उत्सव का नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के उस अभिन्न हिस्से को याद करने का है, जो धीरे-धीरे हमारे कंक्रीट के जंगलों से ओझल होता जा रहा है। "आई लव स्पैरो" (I Love Sparrow) की थीम के साथ इस वर्ष भी लोगों को इस नन्हीं जान के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

पारिस्थितिकी तंत्र में भागीदारी और आवश्यकता

गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण 'बायो-इंडिकेटर' है।

  • कीट नियंत्रण: गौरैया अपने बच्चों को खिलाने के लिए अल्फाल्फा जैसे पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का शिकार करती है, जिससे यह प्राकृतिक रूप से फसलों की रक्षा करती है।

  • खाद्य श्रृंखला: खाद्य श्रृंखला (Food Chain) को संतुलित रखने में इसकी भूमिका अहम है। गौरैया की अनुपस्थिति कीटों की संख्या में अनियंत्रित वृद्धि कर सकती है, जो कृषि और मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है।

गौरैया की अनूठी विशेषताएं

  • सामाजिक पक्षी: यह मानवीय बस्तियों के आसपास रहना पसंद करती है और झुंड में रहना इसकी प्रकृति है।

  • अनुकूलन क्षमता: गौरैया शून्य से नीचे के तापमान और अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में भी खुद को ढालने की क्षमता रखती है।

  • सफाई पसंद: इन्हें धूल में स्नान करना (Dust Bath) बहुत पसंद है, जो इनके पंखों की स्वच्छता के लिए आवश्यक होता है।

विलुप्ति की कगार पर क्यों? (संरक्षण की चुनौती)

आधुनिक जीवनशैली ने गौरैया के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है:

  1. कंक्रीट के घर: आधुनिक वास्तुकला में अब पुराने घरों की तरह 'आला' या 'रोशनदान' नहीं होते, जहाँ ये घोंसला बना सकें।

  2. मोबाइल टावर रेडिएशन: शोध बताते हैं कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण इनकी प्रजनन क्षमता और दिशा ज्ञान को प्रभावित करते हैं।

  3. कीटनाशकों का प्रयोग: फसलों और बगीचों में अत्यधिक रसायनों के उपयोग से इनका मुख्य भोजन (कीट-पतंगे) खत्म हो रहा है।

हम कैसे कर सकते हैं संरक्षण?

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि गौरैया को बचाना कठिन नहीं है, बस थोड़ी सी संवेदनशीलता की आवश्यकता है:

  • घर की छत या बालकनी में कृत्रिम घोंसले (Nest Boxes) लगाएं।

  • मिट्टी के सकोरे में साफ पानी और दाना (बाजरा, कणी) नियमित रूप से रखें।

  • अपने बगीचों में रसायनों के बजाय जैविक खाद का उपयोग करें ताकि उन्हें प्राकृतिक भोजन मिल सके।


विशेष संदेश: गौरैया का हमारे आंगन से जाना इस बात का संकेत है कि हमारा पर्यावरण अस्वस्थ हो रहा है। आइए, इस विश्व गौरैया दिवस पर हम अपने घरों में उनके लिए एक छोटा सा कोना सुरक्षित करने का संकल्प लें।

कंचन यादव 
सहसंपादक/नारद एक्स्प्रेस न्यूज