शौर्य गाथा: कारगिल के 'तोलोलिंग' विजेता अमर शहीद मेजर विवेक गुप्ता की सर्वोच्च बलिदान की अमर कहानी
भारतीय सैन्य इतिहास में 26 जुलाई 1999 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, जिसे हम 'विजय दिवस' के रूप में मनाते हैं। इस ऐतिहासिक विजय की नींव में कई जांबाज सैनिकों का रक्त और बलिदान शामिल है। कारगिल युद्ध के उन्हीं अमर नायकों की प्रथम पंक्ति में मेजर विवेक गुप्ता का नाम बड़े ही आदर, सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। तोलोलिंग चोटी पर तिरंगा फहराने के लिए उन्होंने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, उसकी चर्चा युगों-युगों तक की जाएगी।
जीवनी: देशभक्ति के माहौल में बीता बचपन
मेजर विवेक गुप्ता का जन्म वर्ष 1970 में उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों के बीच बसे देहरादून में हुआ था। विवेक गुप्ता को देशभक्ति और सैन्य अनुशासन विरासत में मिला था। उनके पिता कर्नल बी. आर. एस. गुप्ता स्वयं भारतीय सेना के एक सम्मानित अधिकारी थे। बचपन से ही घर में सेना के माहौल और पिता की वर्दी को देखकर विवेक ने भी देश सेवा का संकल्प ले लिया था। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे भारतीय सेना की प्रसिद्ध रेजीमेंट '2 राजपूताना राइफल्स' (2 Rajputana Rifles) में शामिल हुए। युद्ध के समय वे राष्ट्रीय राइफल्स में भी अपनी सेवाएं दे रहे थे।
बलिदान की कहानी: जब तोलोलिंग पर दुश्मन के दांत खट्टे किए
साल 1999 में जब भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा, तब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने सामरिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण चोटी 'तोलोलिंग' पर अवैध कब्जा कर लिया था। ऊंचाई पर होने के कारण दुश्मन भारतीय सेना पर लगातार भारी गोलाबारी कर रहा था। भारतीय सेना के लिए इस चोटी को मुक्त कराना सबसे पहला और अनिवार्य लक्ष्य था।
-
कठिन और चुनौतीपूर्ण मिशन: कमान अधिकारी ने इस बेहद दुर्गम और मौत के समान कठिन मिशन की जिम्मेदारी मेजर विवेक गुप्ता को सौंपी। मेजर विवेक और उनकी कंपनी ने इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया।
-
12 जून की वो ऐतिहासिक रात: 12 जून 1999 की काली रात को मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में भारतीय जांबाज तोलोलिंग चोटी पर विजय पाने के लिए रवाना हुए। पहाड़ी की चोटी पर घात लगाकर बैठे दुश्मनों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
-
गोलियां खाकर भी नहीं थमे कदम: इस भीषण मुठभेड़ के दौरान मेजर विवेक गुप्ता को दो गोलियां लगीं। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और खून बहने लगा, लेकिन भारत मां के इस लाडले का हौसला टस से मस नहीं हुआ।
-
अंतिम सांस तक पराक्रम: घायल अवस्था में ही मेजर विवेक रेंगते हुए आगे बढ़े और आमने-सामने की लड़ाई में तीन पाकिस्तानी घुसपैठियों को मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने न सिर्फ दुश्मन के बंकर पर कब्जा किया, बल्कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अंतिम सांस तक लड़ते रहे।
13 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता ने तोलोलिंग चोटी पर तिरंगा लहराकर वीरगति का आलिंगन किया। उनके इस बेजोड़ सैन्य कौशल के कारण बड़ा क्षेत्र दुश्मन के चंगुल से मुक्त हो गया।
जब वीर गाथा देख फूट-फूट कर रो पड़े थे कपिल देव
उन्हीं दिनों देश में क्रिकेट वर्ल्ड कप भी चल रहा था। जब समाचार पत्रों और टीवी पर मेजर विवेक गुप्ता की शहादत की खबर प्रकाशित हुई, तो भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए। उन्हें पाकिस्तान की इस कायराना हरकत पर इतना गुस्सा आया कि उन्होंने सरकार से साफ कह दिया था कि— "बहुत हुआ, अब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना बंद करो, हमें उनसे खेल की कमाई नहीं चाहिए।"
पत्नी कैप्टन जयश्री का वो 'लास्ट सैल्यूट' जिसने देश को रुला दिया
मेजर विवेक गुप्ता का पार्थिव शरीर जब दिल्ली पहुंचा, तो अपने नायक को अंतिम विदाई देने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। इस दौरान एक ऐसा भावुक दृश्य सामने आया जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। मेजर विवेक गुप्ता की पत्नी कैप्टन जयश्री (जो स्वयं सेना में अधिकारी थीं) पूरी सैन्य वर्दी में वहां पहुंचीं। उन्होंने अपने आंसुओं को रोककर, एक जांबाज सैनिक की तरह अपने शहीद पति को सैन्य धुन पर 'सैल्यूट' किया। इस दृश्य को देखकर टीवी के सामने बैठे कपिल देव भी फूट-फूट कर रोने लगे थे।
मरणोपरांत 'महावीर चक्र' से हुए सम्मानित
रणक्षेत्र में अद्भुत नेतृत्व, अद्वितीय पराक्रम और मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने के लिए भारत सरकार द्वारा मेजर विवेक गुप्ता को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े सैन्य सम्मान 'महावीर चक्र' से विभूषित किया गया।
मेजर विवेक गुप्ता की यह शौर्य गाथा देश की आने वाली पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्रवाद और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देती रहेगी।
देश के ऐसे महान और अमर बलिदानी को शत्-शत् नमन!
प्रेम प्रकाश साहू
संपादक/नारद एक्सप्रेस न्यूज