छत्रपति संभाजी महाराज बलिदान दिवस: शौर्य और अटूट धर्मनिष्ठा की अमर गाथा
आज पूरा देश धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज के बलिदान दिवस पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। संभाजी महाराज का जीवन वीरता, साहस और स्वाभिमान का एक ऐसा ज्वलंत उदाहरण है, जिसने मुगल साम्राज्य की जड़ों को हिला कर रख दिया था।
अजेय योद्धा: 120 युद्धों में अपराजित
छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी महाराज ने मात्र 14 वर्ष की आयु में ही घुड़सवारी, तीरंदाजी और तलवारबाजी में महारत हासिल कर ली थी। उनके पराक्रम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने 9 साल के शासनकाल में उन्होंने लगभग 120 युद्ध लड़े और एक भी युद्ध में उन्हें पराजय का सामना नहीं करना पड़ा।
उन्होंने न केवल मुगलों, बल्कि पुर्तगालियों, अंग्रेजों और सिद्धियों को भी नाको चने चबवा दिए थे।
क्रूर यातनाएं भी नहीं डिगा सकीं मनोबल
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जब औरंगजेब ने संभाजी महाराज को धोखे से बंदी बनाया, तब उसने उनके सामने तीन शर्तें रखी थीं:
मराठा साम्राज्य के सभी किले और खजाना मुगलों को सौंप दें।
उन गद्दारों के नाम बताएं जिन्होंने मुगलों के खिलाफ साजिश रची।
अपना धर्म त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लें।
संभाजी महाराज ने बिना डरे औरंगजेब की आंखों में आंखें डालकर इन शर्तों को ठुकरा दिया। इसके बाद उन्हें 40 दिनों तक ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गईं जिन्हें सुनकर आज भी रूह कांप जाती है। उनकी आंखें निकाल ली गईं, जीभ काट दी गई और नाखूनों को उखाड़ दिया गया, लेकिन उनके मुख से केवल "हर हर महादेव" का ही उद्घोष निकलता रहा।
बलिदान जिसने मराठा साम्राज्य को पुनर्जीवित किया
11 मार्च 1689 को फाल्गुन अमावस्या के दिन संभाजी महाराज ने धर्म और स्वराज्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। औरंगजेब का मानना था कि शंभू राजे की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य खत्म हो जाएगा, लेकिन इसके विपरीत उनके बलिदान ने पूरे महाराष्ट्र में राष्ट्रभक्ति की ऐसी ज्वाला भड़काई कि अगले 27 वर्षों तक मराठों ने मुगलों से भीषण संघर्ष किया और अंततः मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बने।
आज की प्रासंगिकता
संभाजी महाराज केवल एक राजा नहीं, बल्कि धैर्य और अडिग विश्वास के प्रतीक हैं। उनका बलिदान हमें सिखाता है कि राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी कीमत चुकाने में कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।
"धरा थर्राई, गगन गूंजा, जब शंभू का हुंकार हुआ,
झुका नहीं वो अत्याचारी के आगे, वह ऐसा शेर सवार हुआ।"
"देश-धर्म पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था।
महापराक्रमी परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।"
कंचन यादव
सहसंपादक/नारद एक्सप्रेस न्यूज