छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सेवा से बर्खास्त 8 कर्मचारी होंगे बहाल, 'प्राकृतिक न्याय' की अनदेखी पर सरकार को फटकार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सेवा से बर्खास्त 8 कर्मचारी होंगे बहाल, 'प्राकृतिक न्याय' की अनदेखी पर सरकार को फटकार

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़ा झटका देते हुए 'छत्तीसगढ़ काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी' (CCOST) के 8 कर्मचारियों की बर्खास्तगी को अवैध घोषित कर दिया है। जस्टिस बी.डी. गुरु की एकल पीठ ने सरकार के आदेश को निरस्त करते हुए सभी कर्मचारियों को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।

1. बर्खास्तगी असंवैधानिक और मनमानी

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इन कर्मचारियों को हटाने की प्रक्रिया में "प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों" का पूरी तरह उल्लंघन किया गया। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां निम्नलिखित हैं:

  • अनुच्छेद 311(2) का संरक्षण: कोर्ट ने माना कि नियमित सेवा में आने के बाद कर्मचारी संवैधानिक सुरक्षा के हकदार हैं। बिना विभागीय जांच और सुनवाई के किसी भी सरकारी कर्मचारी को पद से हटाना असंवैधानिक है।

  • धोखाधड़ी का प्रमाण नहीं: शासन यह साबित करने में विफल रहा कि नियुक्तियां किसी धोखाधड़ी के जरिए हुई थीं। 6-7 साल की सेवा के बाद बिना ठोस कारण के सेवा समाप्त करना निंदनीय है।

  • पिछला घटनाक्रम: इन कर्मचारियों की नियुक्ति 2012 में चतुर्थ श्रेणी पद पर हुई थी। नियमितीकरण की मांग करने पर प्रशासन ने उनकी वेतन कटौती कर दी थी, जिसे कोर्ट पहले ही अवैध ठहरा चुका था।


2. "वकील की गलती की सजा मुवक्किल को नहीं"

एक अन्य जमीन विवाद से जुड़े मामले में जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने न्यायशास्त्र का एक अहम सिद्धांत दोहराया। कोर्ट ने कहा कि यदि वकील की लापरवाही या चूक के कारण कोई पक्षकार समय पर अदालत में उपस्थित नहीं हो पाता या याचिका दायर नहीं कर पाता, तो उसकी सजा मुवक्किल को नहीं मिलनी चाहिए।

कोर्ट का मानवीय दृष्टिकोण:

"जब कोई पक्षकार वकील नियुक्त कर देता है, तो वह इस विश्वास में रहता है कि उसका मामला सही तरीके से पेश किया जाएगा। वकीलों की लापरवाही के कारण मुकदमा लड़ने वालों को नुकसान नहीं होना चाहिए। ऐसे मामलों में अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए।"

हाईकोर्ट ने इस मामले में हुई देरी को माफ करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि मामले पर 'गुण-दोष' (Merits) के आधार पर फिर से विचार किया जाए।

निष्कर्ष: प्रशासन के लिए कड़ा संदेश

हाईकोर्ट के ये दोनों फैसले प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं कि प्रशासनिक शक्तियां असीमित नहीं हैं। किसी भी कर्मचारी या नागरिक के अधिकारों का हनन बिना उचित कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई के नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है जो पिछले कई वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।

कंचन यादव

सहसंपादक/नारद एक्स्प्रेस न्यूज