"आर्थिक अपराध कोई सामान्य गुनाह नहीं": ढेबर की याचिका पर हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मैनपावर सप्लाई घोटाले के मुख्य आरोपी अनवर ढेबर को करारा झटका देते हुए उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे अपराध समाज और देश की अर्थव्यवस्था की नींव खोखला करने वाली एक सुनियोजित साजिश होते हैं।
प्रमुख बिंदु: क्यों नहीं मिली राहत?
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मुख्य साजिशकर्ता: कोर्ट ने अनवर ढेबर को इस पूरे घोटाले का मुख्य सूत्रधार और अंतिम लाभार्थी (Beneficiary) माना है।
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जनता के पैसे की लूट: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब मामला सरकारी खजाने और जनता की गाढ़ी कमाई की लूट से जुड़ा हो, तो अदालतें ढिलाई नहीं बरत सकतीं।
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प्रभाव का गलत इस्तेमाल: जांच रिपोर्ट के अनुसार, ढेबर ने अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग कर CSMCL (छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड) के वित्तीय निर्णयों में अवैध दखल दिया।
क्या है पूरा घोटाला?
यह मामला मैनपावर सप्लाई करने वाली निजी एजेंसियों से अवैध कमीशनखोरी और कर्मचारियों के ओवरटाइम भुगतान में भ्रष्टाचार से जुड़ा है। जांच में सामने आया कि:
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अवैध कमीशन: निजी एजेंसियों के बिल तब तक पास नहीं किए जाते थे, जब तक वे तय कमीशन नहीं देते।
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दरों में वृद्धि: शुरुआत में कमीशन एक निश्चित दर पर था, जिसे बाद में ढेबर के निर्देश पर बढ़ाकर बिल राशि का एक-तिहाई (33%) या उससे अधिक कर दिया गया।
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वसूली का जाल: निगम के तत्कालीन अधिकारी और कुछ निजी लोग बिचौलियों के रूप में काम करते थे, जो एजेंसियों से रकम वसूल कर अनवर ढेबर तक पहुँचाते थे।
ED और ACB की कार्रवाई
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 29 नवंबर 2023 को एक ट्रैप के दौरान 'ईगल हंटर सॉल्यूशंस' एजेंसी के पास से 28.80 लाख रुपये नकद बरामद किए थे। इसी छापेमारी में मिले डिजिटल और दस्तावेजी सबूतों के आधार पर 23 फरवरी 2026 को अनवर ढेबर की गिरफ्तारी हुई थी। वर्तमान में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) इस मामले में धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार की धाराओं के तहत जांच कर रही है।
बचाव पक्ष के तर्क हुए विफल
अनवर ढेबर की ओर से पैरवी करते हुए तर्क दिया गया था कि उन्हें राजनीतिक द्वेष के चलते फंसाया जा रहा है और एक ही मामले में बार-बार अलग FIR दर्ज करना 'कस्टडी की एवरग्रीनिंग' है। हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को दरकिनार करते हुए कहा कि केवल प्रभावशाली होना या सीधे हाथ में पैसा न पकड़ा जाना, आरोपी को राहत देने का आधार नहीं हो सकता।
कोर्ट की टिप्पणी: "आर्थिक अपराध सामान्य अपराध नहीं हैं। ये सरकारी व्यवस्था में जनता के विश्वास को चोट पहुँचाते हैं। ऐसे मामलों में अदालत को विशेष रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है।"
रिपोर्ट:मयंक श्रीवास्तव
नारद एक्स्प्रेस न्यूज